रे बाबू, अगर पूरब के हवा में सांस लेनी है और गंगा-सरयू के तीर के इतिहास को खंगालना है, तो भूमहार (बाभन) समाज के कथा जाने बिना बात अधूरी रह जाई। आई, आज तनी खटिया पर बइठ के इहौ जान लीं कि ई माटी के लाल लोग कहाँ से आए, इनका इतिहास का बा और इहाँ के लोगन के रहन-सहनकैसन बा!
१. नामकरण आ पहचान: का हवे "भूमहार"?
नाम से ही साफ बा—"भूमि" यानी माटी, आ ओकरा के संवारे वाला या ओकर रखवारी करे वाला यानी "हार"। लोग इनका प्यार से बाभन भी कहेला। पहिले के जमाना में जब लोग ब्राह्मण कुल से हो के भी खेती-बारी, तलवारबाजी आ माटी के प्रबंधन संभाले लगलन, त धीरे-धीरे इनका पहचान भूमहार ब्राह्मण के रूप में स्थापित हो गइल।
२. उत्पत्ति के किस्सा: कहाँ से भइल इनका जनम?
इतिहास में इहाँ के जनम के लेके दुगो-तीनगो बड़ी मजबूत कहानी चलत बा:
परशुराम भगवान के वरदान: पहिलका कथा ई कहैला कि जब भगवान परशुराम धरती के क्षत्रियों से विहीन कइलन, त ओही खाली भइल धरती के रक्षा आ समाज के सुचारू रूप से चलावे खातिर ब्राह्मण लोगन के आगे कइलन। ओही लोगन से ई महान कुल आगू बढ़ल।
बौद्ध काल से जुड़ाव: दूसरका इतिहासकारन के माने त, जब मगध आ अंग देश में बौद्ध धर्म के बहुत बोलबाला रहै, त बहुत सारा ब्राह्मण लोग बौद्ध भिक्षु बन गइल रहै। फेर समय बदलला पर जब ओ लोग दुबारा समाज के मुख्यधारा में लौटलन, त खेती-बारी आ समाज संभालते-संभालते एक नया रूप में सामने आए, जकरा 'बाभन' कहल गइल।
जमींदारी आ सनद: राजा-महाराजा लोगन से मिलल माटी के बड़ा-बड़ा जागीर आ फौजी सनद के वजह से भी ई लोग 'भूमहार' कहलाईं।
३. इतिहास आ राजनीतिक रुतबा: जब बाजी हाथ में रहे
अरे भाई, मध्यकाल आ अंग्रेज के जमाना में ई लोगन के धमक अइसन रहे कि पूछिए मत!
बड़का रियासत आ जमींदारी: सोलहवीं से अठारहवीं शताब्दी आते-आते भूमहार परिवारन के पास विशाल रियासत हो गइल। बनारस के महाराजा होखे, चाहे बेतिया, टेकारी, हथुआ आ तमूही के राजा—सब जगह इहाँ के लोगन के बड़ा भारी दबदबा रहे।
बग़वत आ आजादी के लड़ाई: अंग्रेजन के नींद उड़ावे वाला बनारस के राजा चेत सिंह के नाम त सब कोई जानेला। 1781 में वारेन हेस्टिंग्स के खिलाफ जे लड़ाई भइल, ओकर गवाही इतिहास के पन्नों में दर्ज बा। आजादी के लड़ाई में भी इहाँ के नेता आ स्वतंत्रता सेनानी बढ़-चढ़ के हिस्सा लेलें।
४. कहाँ बाड़न ई लोग? (बड़ा केंद्र आ जनघनत्व)
अगर खोजे निकलब त पूरा पूरब उत्तर प्रदेश (यानी पुरवांचल) आ बिहार के माटी में इनका खून-पसीना रमल बा:
बिहार: बिहार के त मेरुदण्ड कहल जा सकेला। खास कर के मगध, मिथिला, आ भोजपुर इलाका में ई लोग भरपूर संख्या में बाड़े।
उत्तर प्रदेश: यूपी के पुरवांचल में त गोटी जमाए बइठल बाड़े लोग। बलिया, गाजीपुर, वाराणसी, गोरखपुर, देवरिया, मिर्जापुर—हर कोना में इहाँ के लोगन के मजबूत पकड़ बा।
देश-दुनिया तक: अब जमाना बदल गइल बा, त पढ़ाई आ नौकरी-पेशा के चक्कर में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता से ले के सात समंदर पार तक भूमहार परिवार के लोग बड़का-बड़का ओहदा पर बैठल बाड़े।
५. रहन-सहन, खान-पान आ संस्कृति: माटी से जुड़ल जिनगी
पेशा (खेती से कॉर्पोरेट तक): पहिले के जमाना में मुख्य पेशा खेती-किसानी आ जमींदारी रहे। बाकिर पिछला एक सदी में पढ़ाई-लिखाई पर अइसन ध्यान गइल कि आज इहाँ के लइका-लइकी डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस-आईपीएस, वैज्ञानिक आ बड़का कॉर्पोरेट बॉस बन चुकल बाड़े।
त्योहार आ मेला: माटी के लोग हवें, त परब-त्योहार भी बड़ी धूमधाम से मनावे लें। होली, दिवाली, छठ पूजा, मकर संक्रांति—हर जगह परिवार के सब लोग मिल के हुड़दंग मचावेला आ खुशिया मनावेला।
खान-पान आ स्वभाव: स्वभाव से एकदम अडिग, स्वाभिमानी आ मेहमाननवाजी में सबसे आगे! खान-पान में पहिले शुद्ध शाकाहारी भोजन पर जोर रहे, बाकिर आज के आधुनिक समय में लोग अपना हिसाब से सादगी आ आधुनिक खान-पान दोनों अपना लेले बा।

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सोलहवीं से अठारहवीं शताब्दी आते-आते भूमहार परिवारन के पास विशाल रियासत हो गइल। बनारस के महाराजा होखे, चाहे बेतिया, टेकारी, हथुआ आ तमूही के राजा—सब जगह इहाँ के लोगन के बड़ा भारी दबदबा रहे
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Jay ho